Input By: Nikil Sharma (Sr. Journalist)
Meerut (UP): उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर के शास्त्रीनगर स्थित सेंट्रल मार्केट में सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देशों का पालन करते हुए उत्तर प्रदेश आवास एवं शहरी नियोजन विभाग ने बड़ा बुलडोजर एक्शन चलाया. आवासीय भूखंड पर अवैध रूप से बने व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स को ताश के पत्तों की तरह ढहा दिया गया, जिसमें करीब 22 दुकानें और प्राइवेट ऑफिस शामिल थे. यह कार्रवाई 17 दिसंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी आदेशों के क्रम में की गई. कोर्ट ने अवैध निर्माणों को वैध ठहराने के हर प्रयास को सिरे से खारिज कर दिया था, लेकिन अधिकारी ऐसा नहीं कर सके तो फिर अवमानना याचिका दायर की गई. सर्वोच्च न्यायालय ने अधिकारियों से जवाब मांगा तो न सिर्फ बिल्डिंग को गिराने की कार्रवाई की गई, बल्कि 22 व्यापारियों के साथ 45 अधिकारियों व कर्मचारियोें पर 3 एफआईआर भी दर्ज करा दी गई. ध्वस्तीकरण प्रक्रिया के दौरान भारी पुलिस बल, पीएसी जवान और अग्निशमन वाहनों की तैनाती की गई. ड्रोन कैमरों से पूरे इलाके पर नजर रखी गई, जबकि आसपास के रास्तों पर वाहनों का आवागमन रोक दिया गया. शनिवार को इस कॉम्प्लेक्स के 90 प्रतिशत हिस्से को गिराया जा चुका था, और रविवार को बाकी बचा 10 प्रतिशत हिस्सा, जो आसपास की इमारतों से जुड़ा हुआ था, भी जमींदोज कर दिया गया. यह विवादास्पद मामला 1986 से चला आ रहा है, जब प्लॉट नंबर 661/6 को आवासीय उपयोग के लिए आवंटित किया गया था, लेकिन धीरे-धीरे यहां व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स का निर्माण हो गया, जिसके खिलाफ 1990 में ही आवास विकास परिषद ने नोटिस जारी कर दिया था. लंबी कानूनी लड़ाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 17 दिसंबर 2024 को फैसला सुनाते हुए कहा कि प्रशासनिक देरी, “समय बीतने या वित्तीय निवेश के आधार पर अवैध निर्माण को वैध नहीं माना जा सकता.” न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और आर महादेवन की बेंच ने स्पष्ट निर्देश दिए कि ऐसी इमारतों को तत्काल ध्वस्त किया जाए. कार्रवाई से पहले मुनादी कराई गई थी, जिसके बाद व्यापारियों ने रातभर अपना सामान समेटा. कई ने सामान घर ले जाकर रखा, तो कुछ ने किराए पर जगह लेकर स्टोर किया. दुकानदारों का रो-रोकर बुरा हाल था. कॉम्पलैक्स को तोड़ने के लिए 1 करोड़ 66 लाख रूपए का टेंडर जारी किया गया था. सैंट्रल मार्केट ध्वस्तीकरण मामले में सवाल है कि अवैध निर्माणकर्ता की बात छोड़ दी जाए तो, उन दुकानदारों का आखिर क्या गुनाह जिन्होंने अपने जीवनभर की पूंजी कॉप्लैक्स में बनी दुकानों में लगा दी थी. उनकी रोजी रोटी चली गई. सवाल है कि आखिर अवैध निर्माण कराने वाले अधिकारियों पर कोई सख्त कार्रवाई क्यों नहीं की गई.




































