April 18, 2026 8:31 pm

आधुनिकता में कहां खो रहा है मासूम बचपन, इस चिंताजनक सच्चाई को जरूर समझिए

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Write By- Sajid Ali Satrangi
बचपन किसी भी इंसान की ज़िंदगी का सबसे मासूम, सबसे नाजुक और सबसे अहम दौर होता है. यह वह उम्र होती है जब संस्कार, शिक्षा और परवरिश की नींव रखी जाती है. लेकिन आज यह पाकिज़ा दौर भी बहकावों और भटकावों की भेंट चढ़ता जा रहा है. मोबाइल, इंटरनेट, सामाजिक दबाव, बिगड़ता पारिवारिक माहौल और शिक्षा का व्यावसायीकरण-इन सबने मिलकर बचपन की मासूमियत पर ग्रहण लगा दिया है. आज का ब,च्चा जितना तकनीकी रूप से तेज है, उतना ही भावनात्मक रूप से अकेला भी होता जा रहा है. स्मार्टफोन की स्क्रीन पर घंटों बिताने वाले ये बच्चे असली दुनिया से कटते जा रहे हैं. खासकर किशोरावस्था की दहलीज पर खड़े  बच्चे सामाजिक माध्यमों से सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं। वे अपने आदर्श अब माता-पिता या शिक्षकों में नहीं, बल्कि इंटरनेट के ‘इन्फ्लुएंसर्स’ में ढूंढते हैं. फैशन, नशा, अश्लीलता और आक्रामकता जैसी चीजें सहजता से उनके स्वभाव का हिस्सा बनती जा रही हैं. संस्कारों की जगह ‘ट्रेंड्स’ ने ले ली.
इस विकृति का एक और बड़ा कारण है पारिवारिक संरचना में आई गिरावट. संयुक्त परिवारों का टूटना, माता-पिता की व्यस्तता, और संवादहीनता ने ब,च्चों को मानसिक रूप से असहाय बना दिया है. आज के माता-पिता सामाजिक रसूख, एवं समाज में अपने को बेहतर दिखाने के चक्कर में ब,च्चों को ‘टॉप रैंक’ दिलाने में तो दिन-रात एक कर देते हैं, लेकिन उनके मन की बात सुनने का वक्त नहीं निकाल पाते. ब,च्चे भटकते हैं, क्योंकि उन्हें दिशा देने वाला कोई नहीं होता. वे बहकते हैं, क्योंकि उन्हें समझने वाला कोई नहीं होता. दोस्ती ‘ऑनलाइन स्टेटस’ से मापी जाती है. यह नकली जुड़ाव ब,च्चों के भीतर गहराई से खालीपन भर रहा है. कबड्ड़ी, गुल्ली डंडा, ऊंची कूद,बेस बाॅल, आदि खेल इनकी जिंदगी से विलुप्त हो गए हैं. शिक्षा प्रणाली ब,च्चों को प्रतिस्पर्धा में धकेल रही है, लेकिन उन्हें संयम, सहनशीलता और करुणा जैसे गुणों से वंचित कर रही है। नैतिक शिक्षा केवल पाठ्यक्रम में सीमित रह गई है-व्यवहार में नहीं. समाज, परिवार, स्कूल सभी को एकजुट होकर इस बहकते बचपन को सँभालना होगा. मोबाइल और स्क्रीन टाइम को सीमित कर, ब,च्चों को प्रकृति और खेल से जोड़ना होगा. डिजिटल दुनिया से निकालकर संवेदनशील, सृजनशील और संजीदा वास्तविकता से जोड़ना होगा. नैतिक शिक्षा, खेलकूद, कला-संस्कृति और खुला संवाद ये सारे उपाय फिर से सक्रिय करने होंगे. ब,च्चों को सुनना होगा, समझना होगा, उन्हें ‘गाइड’ नहीं, ‘साथी’ बनकर जीना सिखाना होगा. बचपन अगर बहक गया, तो भविष्य भटक जाएगा. यदि यह भटक गया, तो केवल एक पीढ़ी नहीं, बल्कि पूरी सभ्यता डगमगा जाती है. इसलिए अब वक्त आ गया है कि हम सब मिलकर फिर से बचपन को बचाएं, इसे बहकने नहीं खिलने दें.
“क्या हसीं थें वो मेरे बचपन के दिन
लोरियाॅं जब माॅं सुनाया करती थीं”

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