July 29, 2026 3:49 am

जम्मू-कश्मीर, हिमाचल और उत्तराखंड में मॉनसून ने क्यों बरपाया कहर विशेषज्ञों ने बतायी असली सच्चाई

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New Delhi: मूसलाधार बारिश, बादल फटने, बाढ़ और भूस्खलन की घटनाओं ने इन हिमालयी राज्यों में जनजीवन को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया. नदियों के उफान, सड़कों का क्षतिग्रस्त होना और बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचने से लाखों लोग प्रभावित हुए. बाढ़ और बारिश के कारण मॉनसून की सक्रियता भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, बंगाल की खाड़ी में बना निम्न दबाव का क्षेत्र उत्तर-पश्चिम की ओर बढ़ा, जिसने जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में मॉनसून को असामान्य रूप से सक्रिय कर दिया. इसने भारी से बहुत भारी बारिश को बढ़ावा दिया. हिमालयी क्षेत्रों में खड़ी ढलानें और कमजोर मिट्टी भूस्खलन और अचानक बाढ़ के लिए अतिसंवेदनशील हैं. भारी बारिश ने मिट्टी को और कमजोर कर दिया, जिससे भूस्खलन और नदियों में अचानक उफान की स्थिति पैदा हुई. जम्मू-कश्मीर के डोडा और किश्तवाड़, हिमाचल के कांगड़ा और कुल्लू, और उत्तराखंड के उत्तरकाशी में बादल फटने की घटनाओं ने स्थानीय नदियों और नालों में अचानक बाढ़ ला दी. किश्तवाड़ के चशोटी गांव में 14 अगस्त को बादल फटने से 40 लोग मारे गए और 200 से अधिक लापता हुए. लोगों से नदियों, नालों और भूस्खलन संवेदनशील क्षेत्रों से दूर रहने की अपील की गई. आपात स्थिति के लिए हेल्पलाइन नंबर 1077 और 112 जारी किए गए.
जम्मू-कश्मीर के हालात
जम्मू में 26 अगस्त को 190.4 मिमी बारिश ने 99 साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया. तवी और झेलम नदियां खतरे के निशान से ऊपर बहने लगीं. जिससे जम्मू शहर और आसपास के इलाकों में बाढ़ का पानी घुस गया. कटरा में वैष्णो देवी यात्रा मार्ग पर भूस्खलन से 34 लोगों की मौत हुई, और यात्रा स्थगित कर दी गई. डोडा में बादल फटने से चार लोगों की मौत और कई मकान-पुल ढह गए. किश्तवाड़ में 14 अगस्त को बादल फटने से 40 लोगों की जान गई. जम्मू-श्रीनगर और जम्मू-पठानकोट हाईवे सहित कई सड़कें रेल सेवाएं रोकनी पड़ी. स्कूल-कालेजों की भी छुट्टी कर दी गई.
हिमाचल प्रदेश के हालात
मंडी, कुल्लू, कांगड़ा और चंबा में ब्यास नदी का जलस्तर बढ़ने से बाढ़ जैसे हालात हैं. मंडी में पंडोह डैम से एक लाख क्यूसेक पानी छोड़ा गया, जिससे निचले इलाके जलमग्न हो गए. कुल्लू में ब्यास नदी ने एक होटल, 4 दुकानें और मनाली-लेह हाईवे का 200 मीटर हिस्सा बहा दिया. शिमला सहित कई जिलों में 795 सड़कें, 186 जलापूर्ति योजनाएं और 551 पावर ट्रांसफॉर्मर ठप हुए. 20 जून से 25 अगस्त तक बारिश और आपदाओं से 306 लोगों की मौत और 2,454 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ.
उत्तराखंड के हालात
देहरादून, पौड़ी, नैनीताल और बागेश्वर में भारी बारिश और भूस्खलन ने यमुनोत्री नेशनल हाईवे को बाणस के पास बंद कर दिया. उत्तरकाशी में बादल फटने से कई गांव प्रभावित हुए, और गंगा व यमुना नदियों का जलस्तर बढ़ गया. हरिद्वार में गंगा खतरे के निशान से 24 सेंटीमीटर ऊपर पहुुंच गई. थराली और धराली में बाढ़ प्रभावितों के लिए 5 लाख रुपये की सहायता की घोषणा की गई. एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, सेना और स्थानीय प्रशासन राहत कार्यों में जुटे. जम्मू-कश्मीर में 3,500 से अधिक लोगों को सुरक्षित निकाला गया.
पंजाब के हालात
पंजाब में लगातार भारी बारिश और हिमाचल प्रदेश व जम्मू-कश्मीर से आए पानी के कारण सतलुज, ब्यास और रावी नदियों में उफान ने बाढ़ की स्थिति को गंभीर कर दिया. नदियों के उफान ने पंजाब के लिए गंभीर चुनौती पेश की. पठानकोट, गुरदासपुर, कपूरथला, फिरोजपुर, फाजिल्का, तरनतारन, होशियारपुर और अमृतसर जैसे जिलों में हालात सबसे ज्यादा प्रभावित हुए. हजारों एकड़ कृषि भूमि जलमग्न हो गई, जिससे धान की फसल को भारी नुकसान का खतरा मंडराया. कपूरथला के सुल्तानपुर लोधी में धुस्सी बांध के टूटने से 30-35 गांवों में पानी घुस गया, जिससे लोग अपने घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर जाने को मजबूर हुए.
विशेषज्ञों ने बतायी असली सच्चाई
विशेषज्ञों का कहना है कि अव्यवस्थित निर्माण, जंगल कटाई, और अनियंत्रित खनन ने हिमालयी क्षेत्रों की पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंचाया है. जलवायु परिवर्तन और अनियोजित शहरीकरण ने इन आपदाओं की तीव्रता से बारिश और बाढ़ का प्रभाव बढ़ गया है. जलवायु परिवर्तन के कारण मॉनसून की अनियमितता और तीव्रता भी बढ़ रही है. प्राकृतिक आपदा हिमालयी क्षेत्रों में पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ विकास की जरूरत को रेखांकित करती है. विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार और प्रशासन को दीर्घकालिक योजनाओं के साथ-साथ तत्काल राहत कार्यों पर ध्यान देना होगा ताकि भविष्य में ऐसी त्रासदियों को कम किया जा सके.

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