July 29, 2026 3:49 am

मसूरी वन विभाग का घोटाला: 7,375 बाउंड्री पिलर गायब, अतिक्रमण और भ्रष्टाचार का बड़ा खुलासा

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Dehradun: उत्तराखंड के मसूरी वन प्रभाग में 7,375 बाउंड्री पिलर गायब होने का सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने वन विभाग और स्थानीय प्रशासन में हड़कंप मचा दिया है. हल्द्वानी के मुख्य वन संरक्षक (कार्ययोजना) आईएफएस संजीव चतुर्वेदी ने इस मामले को उजागर करते हुए प्रमुख वन संरक्षक समीर सिन्हा को पत्र लिखकर विशेष जांच दल (SIT) या CBI जांच की मांग की है. इस घोटाले को वन भूमि पर बड़े पैमाने पर अतिक्रमण और अधिकारियों की मिलीभगत से जोड़ा जा रहा है.
संजीव चतुर्वेदी ने अपने पत्र में बताया कि मसूरी वन प्रभाग की कार्ययोजना की समीक्षा के दौरान यह पाया गया कि आधिकारिक मानचित्रों में दर्ज 7,375 बाउंड्री पिलर मौके पर मौजूद नहीं हैं। उन्होंने इसे “असामान्य” और “आपराधिक विश्वासघात” करार देते हुए कहा कि इतनी बड़ी संख्या में पिलर गायब होना बिना अधिकारियों, कर्मचारियों और संभावित राजनीतिक संरक्षण के संभव नहीं है. यह मामला रायपुर रेंज के खलंगा क्षेत्र में लंबे समय से चल रहे अतिक्रमण से भी जुड़ा है, जहां वन भूमि पर अवैध कब्जे की शिकायतें बार-बार सामने आती रही हैं. पत्र में मसूरी के डीएफओ अमित कंवर पर भी सवाल उठाए गए हैं, जिनके कार्यकाल में अतिक्रमण के मामले बढ़े हैं. चतुर्वेदी ने उनकी संपत्तियों की CBI या ED से जांच की मांग की है, जिसमें हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में उनकी कथित संपत्तियों का जिक्र है. उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि भ्रष्टाचार के आरोपों के बावजूद ऐसे अधिकारियों को लगातार इंटीग्रिटी सर्टिफिकेट और आउटस्टैंडिंग ग्रेडिंग क्यों दी जाती रही. मसूरी के डीएफओ अमित कंवर ने जवाब में कहा कि इस मामले की जांच तेजी से चल रही है और एक सप्ताह के भीतर पूरी रिपोर्ट तैयार कर ली जाएगी. उन्होंने यह भी बताया कि जल्द ही इस मामले में FIR दर्ज की जाएगी. कंवर ने अपनी संपत्तियों पर लगे आरोपों का खंडन किया.
क्या कहते हैं स्थानीय लोग और पर्यावरणविद
यह मामला केवल बाउंड्री पिलर गायब होने तक सीमित नहीं है। पर्यावरणविदों और स्थानीय लोगों का कहना है कि मसूरी वन प्रभाग में अवैध निर्माण और अतिक्रमण का खेल लंबे समय से चल रहा है। 2017-18 से 2023-24 के बीच 233 अतिक्रमण के मामले दर्ज थे, जिनमें से 101 को हटाया गया, लेकिन अभी भी 142 मामले बाकी हैं, जिनमें दर्जनों हेक्टेयर वन भूमि अतिक्रमणकारियों के कब्जे में है. इससे पहले भी मसूरी और देहरादून वन प्रभाग विवादों में रहे हैं. खलंगा क्षेत्र में अवैध कैंपिंग साइट बनाने की कोशिश और मियावाकी फॉरेस्ट प्रोजेक्ट में अनियमितताओं के मामले सामने आ चुके हैं. स्थानीय पत्रकार दीपशिखा रावत वर्मा द्वारा खलंगा में अतिक्रमण का वीडियो वायरल होने के बाद वन विभाग को कार्रवाई करनी पड़ी थी. पर्यावरणविदों का कहना है कि मसूरी का खलंगा जंगल ऐतिहासिक और पारिस्थितिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, जहां पुराने साल के पेड़ और जैव-विविधता मौजूद है. इस घोटाले ने उत्तराखंड की पारिस्थितिक सुरक्षा और वन संपदा के संरक्षण पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। विशेषज्ञों ने मांग की है कि वन भूमि की डिजिटल मैपिंग और पारदर्शी निगरानी तंत्र स्थापित किया जाए ताकि भविष्य में ऐसे घोटालों को रोका जा सके.

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